Sunday, April 24, 2011

जाग उठो मुसाफिर......

मेरी यह कविता, कविता नहीं, प्रेरणा के दो बोल हैं,एक अर्ज है......!

उठ जाग मुसाफिर राह तके,
इस राह में सिर को कटा जाना।
कतरा जो लहू का मांगे वतन,
खुद अपनी हस्ती मिटा जाना।।१।।
                                   गर फूल मिलें तुझे राहों में,
                                   उसकी खुश्बू बिखरा जाना।
                                   गर शूल मिलें तुझे राहों में,
                                   उनपर खुद को तू लिटा जाना।।२।। 
जो मौत द्वार दस्तक देती,
कहीं लहू ना पानी बन जाये।
सिंह सा दहाड़ तू बार-बार,
फिर दया ना गुलामी बन पाए।।३।।
                                  पूजा की थाल में फूल नहीं,
                                  तू सिर की भेंट चदा जाना।
                                  तू मोम नहीं पत्थर बनकर,
                                  अंगार पे चलना सिखा जाना।।४।।
गर रंग भेद हो धर्म भेद,
ईश्वर एक बात बता जाना।
अज्ञान अँधेरा बढ़ जाये,
ज्ञान की ज्योति जगा जाना।।५।।
                                  खून की नदियाँ बहती हों,
                                  प्रेम उमंग जगा जाना।
                                  पथभ्रष्ट मानव होने लगे,
                                  तो सच्चा ज्ञान करा जाना।।६।।
मजधार में मानवता पहुंचे,
बेडा पार लगा जाना।
जब कर्म भाग्य के भेद बढे,
गीता का ज्ञान करा जाना।।७।।
                                 आज पुकारूं तुझको में,
                                 मेरी अर्ज ना ठुकरा जाना।
                                 मुझको भरोसा तुझपर है,
                                 दिल पर पत्थर न रख जाना।।८।।


गौरव पन्त
२४ अप्रैल,२०११  
                                 
                                 
                                 
                                     
                 


।।

Friday, April 22, 2011

ये राजनीति है प्यारे.....!

ये राजनीति है प्यारे,
कर देती वारे-न्यारे,
ये राजनीति है प्यारे।।

कुर्सी की खींचातानी है ,
मतलब की एक कहानी है,
तू ना अपना, ना बेगाना,
बस वक़्त की मेहरबानी है,
तेरा मेरा धन यदि,
राजधन होता है,
तो तू है साथ मेरे,
वरना दूर हट जा रे,
ये राजनीति है प्यारे..।।

हाथ जोड़कर विनती करते,
अपने को सेवक ये कहते,
वोट दो राजा बन जाये,
वरना फिर झोली फैलायें,
हुक्का बियर बरंडी रम,
पीते हैं हो ख़ुशी या गम,
आज खड़े हैं हाथ जोडकर,
चुनाव हैं पड़े वोट के लाले,
ये राजनीति है प्यारे..।।

ढोंगी भगत राजनीति के,
राग अलापते हैं कुछ,
हाथी के दांतों के सामान,
होते कुछ हैं और दिखते कुछ,
ये सुखी, अंतर्मुखी,
हों दुखी, तो बहिर्मुखी,
करतूतें करते काले,
इनके उसूल निराले,
ये राजनीति है प्यारे..।।

जीते तो दूर जायेंगे,
हारे तो पास आयेंगे,
हार जीत के खेल में ये,
हमको उलझाते जायेंगे,
जोड़- तोड़ सिरों को फोड़,
मार-काट मचा उत्पात,
हैं जिन्दे चंडाल ये,
हैं इनके खेल निराले,
ये राजनीति है प्यारे..।।


गौरव पन्त
२३ अप्रैल, २०११  
 
     




Thursday, April 21, 2011

मेरी प्यारी माँ मुझसे कभी दूर ना जाना.....!

वो मेरा बचपन,वो मीठी सी यादें,
कहाँ खो गयी हैं हैं, वो मस्ती की बातें;
कभी धूप में, कभी मिट्टी से सनकर,
खेल-खेल की लडाई,और रोकर बिलखकर;
तेरे आँचल से लिपटना,सिसकना सिमटना,
इक प्यारी सी लडाई के,तुझको किस्से बताना;
हर गलती पर मेरी, तेरा डांटकर पुचकारना,
याद आता है माँ, तेरा आँचल सुहाना!!

हर रोज नयी-नयी,शरारतें करना,
परेशान तुझको करना और दूर भाग जाना;
कभी गलती छुपाकर,पापा की मार से बचाना,
तो कभी गलती पर तेरा,यूँ आंखें दिखाना;
मेरा गुस्सा तुझसे होना, रोना बिलखना,
"कट्टी" भी तुझसे करना,और तुझी से लिपटना,
होली में गुजिया,मिठाई दिवाली में चुराना,
याद आता है माँ,वो पिटाई का जमाना!!

मैं दूर हूँ तुझसे,अब यादें रुलाती हैं,
वो तेरी प्यारी-प्यारी मीठी बातें बुलाती हैं,
ऐ माँ!,मैं दौड़कर तेरे पास आना चाहता हूँ,
पर क्यों जिंदगानी,मुझे दूर ही ले जाती है;
जब लौटकर आऊं,तेरे आँचल की छावं में,
फिर से पुचकारेगी मुझे,लिए प्रेम-अश्रु आँख में,
यूँ गोद में खेलेगा फिर,वही बचपन सुहाना,
मेरी प्यारी माँ!, मुझसे कभी दूर ना जाना...!!



गौरव पन्त
२२ अप्रैल, २०११

Monday, November 1, 2010

भारतीय समाज में स्त्रियों की दुर्दशा के लिए दोषी कौन.....?

भारतीय समाज आदिकाल से ही पुरुष प्रधान समाज रहा है । इतिहास के पन्ने पलट लीजिये या वर्तमान पर नजर डालिए, समग्र रूप से सदैव नारी की स्थिति दयनीय ही नजर आयेगी। महिला सशक्तिकरण के लिए किये जा रहे प्रयासों के बावजूद भी लगातार महिला अशक्तिकरण ही हो रहा है और इसका जीता जगता प्रमाण है - लगातार घटता लिंगानुपात एवं महिलाओं पर बड़ते अत्याचार।

मुझे इतिहास की पन्नों को अधिक पलटने की जरुरत नहीं है । पर्दा प्रथा, बाल विवाह , सती प्रथा एवं बहु:विवाह जैसी कुरीतियाँ १९ वीं शताब्दी तक भारतीय समाज में व्याप्त रही हैं । उपभोग की वस्तु के रूप में पौराणिक काल से आजतक उसका उपभोग किया जाता रहा है । बलात्कार, दहेज़ प्रथा एवं कन्या भ्रूण हत्या इस सभ्य एवं सुसंकृत होने का दंभ भरने वाले भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति को भलीभांति प्रदर्शित करते हैं । काश यह सिलसिला यहीं थम गया होता । परन्तु नहीं..! उसपर तो हर रोज अत्याचार होता है । हर उलाहना उसी को सहना पड़ता है चाहे गलती हो या ना हो । क्यों आदि काल से अग्नि परीक्षा केवल स्त्री को ही देनी पड़ी है..? आखिर कौन है दोषी....कौन..?

वास्तव में दोषी है - यह समाज । बराबर के दोषी स्त्री एवं पुरुष । जी हाँ , यही कटु सत्य है की वर्तमान परिस्थितियों में स्त्रिओं क़ी सामाजिक दुर्दशा के लिए स्त्रियाँ भी उतनी ही दोषी हैं जितने पुरुष ।

यह हम सब जानते हैं की घटता लिंगानुपात एक बहुत बड़ी समस्या है और सरकार के अथक प्रयासों के बावजूद भी यह अंतर बढता ही जा रहा है । सरकारी कानूनों को धता बताकर लिंगपरिक्षण भी होते हैं और गर्भपात भी । यह सब भ्रष्ट सरकार एवं संकुचित सोच वाले इसी समाज द्वारा पोषित हो रहा है । सरकार इसलिए क्योंकि प्रशासन को अपराधियों के विषय में समस्त जानकारी होने के बावजूद भी प्रशासन अपराध के इस यज्ञ को तब तक सह देता रहता है जबतक इस पावन यज्ञं से कुछ भाग उसे मिलता रहता है और कार्यवाही तभी होती है जब सिर पर तलवार लटक जाती है । समाज इसलिए दोषी है क्योंकि अधिकांसh शिशु रूप में बालक को ही चाहते हैं क्योंकि लड़की तो उनके लिए पराया धन है , किसी की अमानत है और लड़का बुढ़ापे की लाठी, फिर चाहे लाठी को दीमक ही क्यों ना लग जाए । कब समझेंगे हम की विवाह के पश्चात् भी एक सभ्य सुसंकृत लड़की अपने माता पिता का सहारा बन सकती है , बशर्ते वह लकीर की फ़कीर न बने | कई बार तो स्त्री ही एक कन्या को जन्म नहीं देना चाहती | इसके पीछे चाहे कोई भी भाव क्यों न हो, निर्विवाद रूप से यह अपराध ही है | यदि स्त्री स्वयं स्त्री जाति की रक्षा के लिए आगे नहीं आयेगी तो उसकी दुर्दसा स्वाभाविक ही है |

जिस प्रकार पैसा पैसे को खींचता है उसी प्रकार अपराध अपराध को सह देता है| कभी कभार तो सामाजिक परिस्थितियां ही कन्या भ्रूण हत्या के लिए विवश कर देती है और ऐसी है एक विवशता है - दहेज प्रथा | दहेज प्रथा पर्वतीय अंचलों में तो कम परन्तु मैदानी भागों में एक भयानक महामारी की तरह फ़ैल रही है | इसका भयानक एवं रूह कंपा देने वाला स्वरूप मात्र ही मानवता के तार- तार हो चुके आँचल का वर्णन करने के लिए पर्याप्त है | दहेज के लालची परिवारजनों ने तो स्त्री का जीवन नारकीय बना दिया है | मानसिक एवं दैहिक शोषण से तंग आकर कभी वह आत्महत्या कर लेती है तो कभी उसकी हत्या कर दी जाती है |अक्सर देखा गया है की इन सबके पीछे परिवार का स्त्री पक्ष भी बराबर का दोषी होता है | मैदानी क्षेत्रों में तो लड़के नीलामी की वस्तु बन चुके हैं जिनकी बोली लगायी जाती है | इसी "वैवाहिक - व्यापार " के भय से कई कन्याएँ कोख में ही मार दी जाती हैं | ऐसा भी नहीं की दहेज प्रथा के ये पोषक शिक्षित नहीं हैं | आलम तो यह है कि वर जितना शिक्षित होगा बोली भी उतनी ही ऊँची लगेगी | आखिर विवाह के पवित्र बंधन को व्यापार का रूप देना कहाँ तक उचित है..?

महिला सशक्तिकरण के इस दौर में अब बात कि जाये उस अपराध कि जो अपराध नहीं बल्कि अभिशाप है मानवता के लिए - बलात्कार | बलात्कार की घटनाओं के दिन- प्रतिदिन बड़ते ग्राफ के लिए मुख्यतया पुरुष प्रधान समाज ही जिम्मेदार है परन्तु स्त्रियों की भूमिका को भी नाकारा नहीं जा सकता | हमारे पौराणिक ग्रंथों में स्त्रियों के लिए बताये गए आभूषणों में से वर्तमान समाज के परिपेक्ष्य में उनमे से कुछ या तो औचित्यहीन हो चुके हैं या फिर उन्हें पुनः परिभाषित करना आवश्यक है क्योंकि ये समय की मांग है और उचित भी | परन्तु पश्चिमी सभ्यता के आविर्भाव और आँख मूँद कर उनका अनुकरण की होड़ ने स्त्रियों की दशा को और अधिक बिगाड़ा है | पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण ने कहीं हमारा नैतिक पतन एवं आचार व्यहार में आमूलचूल परिवर्तन किया है तो कहीं फूहड़ता एवं नग्नता का बीजारोपण | मानव विकास के आरंभिक काल में निर्वस्त्र घूमना हमारी मजबूरी थी जो आज फैशन बन चुका है| आज किसी द्रोपदी के चीर - हरण में भगवान कृष्ण आ भी जाएँ तो उन्हें भी सोचना पड़ेगा की वस्त्र हैं ही कहाँ जो बड़ाऊं | वास्तविकता तो यह है कि पश्चिमी आकर्षण ने भारतीय स्त्रिओं को बाहर से तो पश्चिमी बना दिया है किन्तु आज भी अधिकांश आंतरिक रूप से पारंपरिक भारतीय संस्कृति का आदर करती हैं | क्यों नहीं समझती स्त्रियाँ कि दो नावों में पैर रखकर जीवन यात्रा असंभव है , जिस वजह से कभी-कभी बलात्कार, दैहिक एवं मानसिक शोषण के भंवर से गुजरना पड़ता है और पश्चिमी सभ्यता को पूर्ण रूप से अंगीकृत नहीं कर पाने के कारण वे इस भंवर से पार नहीं प़ा पाती | तत्पश्चात हरकत में आता है यह समाज जो पहले शोषण करता है फिर दोषारोपण भी और फिर मानसिक रूप से प्रताड़ित करके उबरने का एक मौका भी नहीं देता |

यहाँ पर कुछ भद्र पुरुष नहिलाओं कि आधुनिक दिखने कि आंधी दौड़, वस्त्रों एवं कामोत्तेजित शैली का वास्ता देकर बलात्कार एवं दैहिक शोषण कि बड़ती घटनाओं कि पूरी हांड़ी महिलाओं के सिर फोड़कर खुद को दूध का धुला साबित करते जरूर नजर आयेंगे | मैं पूछना चाहता हूँ ऐसे पुरुष समाज से - क्या खाने कि थाली में जो कुछ भी परोसा जाता है आप उसे खाद्य- अखाद्य का विचार किये बिना सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं..? ...जहर भी...| नहीं ना.. |
वास्तव में तो हमाम में सब नंगे हैं | आंकड़ों पर नजर डालकर देख लीजिये बलात्कार एवं दैहिक शोषण क़ी शिकार लड़कियों में से अधिकांश का जीवन पश्चिमी जीवनशैली से अछूता है | कई बार तो अबोध एक- दो वर्ष क़ी बच्ची, जो फैशन शब्द का अर्थ तो बहुत दूर, उच्चारण तक सही से नहीं कर सकती, को भी बहशी दरिंदों कि हवस का शिकार होना पड़ता है | मैं और अधिक विस्तार में जाकर अपनी लेखनी को और अधिक शर्मशार नहीं करना चाहता हूँ | अगर आज ऐसी बालिकाएं जिनके दूध के दांत भी सही से नहीं आये , इस आधुनिक सभ्य समाज में सुरक्षित नहीं हैं तो मैं इसका अधिकांश दोष हमारी विकृत मानसिकता को देना चाहूँगा |

काश स्त्रियों कि सामाजिक दुर्दशा कि व्याख्या करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं बचते, परन्तु हकीकत तो यह है कि मैंने वास्तविकता के सागर से आन्चुली मात्र जल ही उठाया है | जगह-जगह खुले वैश्यालय, शराब कि आढ़ में देहा का व्यापार करने वाले मदिरालय विश्व कि सबसे पुरातन सभ्य्त्या को मुंह चिड़ाते नजर आते हैं | आर्थिक सशक्तिकरण के इस दौर में कभी गरीबी एवं दरिद्रता नारी को देह व्यापर के दलदल में घसीटती है तो कभी अनावश्यक
भौतिक जरूरतों, धन एवं पदलोलुपता के वशीभूत नहीं स्वयं ही इस दलदल कि ओर खिंची चली आती है | अश्लीलता को परोसने वाली ब्लू फ़िल्में और C - ग्रेड फिल्मों पर प्रकाश डालकर में शब्दों कि सीमा का उल्लंघन नहीं करना चाहूँगा| इसलिए कहा जाये कि किसी नारी को वैश्या बनाने के लिए समाज ही दोषी है तो कोई अत्शयोक्ति नहीं होगी |

अभी भी बहुत कुछ कहना बाकि है परन्तु में अब रुख करना चाहूँगा भारतीय सामाजिक व्यस्था क़ी ओर जो भी कम दोषी नहीं है स्त्रियों क़ी दुर्दशा के लिए | रामचरितमानस से चौपाई क़ी इस पंक्ति को ही ले लीजिये - " ढोल गंवार शुद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी" | अबला शब्द का प्रयोग आदिकाल से ही उसके लिए होता आ रहा है | हर अग्नि परीक्षा त्रेतायुंग से आज तक केवल स्त्री को ही देनी पड़ी है | पुरातनकाल से ही पुरुष प्रधान समाज स्त्री वर्ग को कमजोर वर्ग क़ी संज्ञा देता आ रहा है और आज भी इसका पोषक है | महिला मंचों से महिला सशक्तिकरण पर चाहे कितनी भी बड़ी बड़ी बातें क्यों न बोल दी जायें, समाज क़ी सबसे सूक्ष्म इकाई परिवार तक पहुँचते- पहुँचते सभी आवाजें दब जाती हैं | कन्या आज भी हमे पराया धन ही नजर आता है |

महिला सशक्तिकरण क़ी कलई खोलने वाली एक और समस्या है - बाल विवाह | वैसे तो बाल - विवाह का सम्बन्ध लड़के और लड़की दोनों से है किन्तु अक्सर यह भी देखा गया है क़ी कम उम्र क़ी लड़की को अधिक उम्र के लड़के के साथ पैसों के लालच में जानवरों क़ी भांति हांक दिया जाता है तो कहीं शादी क़ी रश्म के नाम पर बेच दिया जाता है | विधवा विवाह और तलाकशुदा लड़की के पुनःविवाह को हमारा समाज आज तक मान्यता नहीं दे सका है | हमारे इस पारंपरिक समाज में माता पिता अपने लड़के का पुनः विवाह तो कर सकते हैं किन्तु किसी तलाकसुदा अथवा विधवा को अपनी बहू बनाना उन्हें मंजूर नहीं | विवाह के पश्चात् अगर पति मर जाये तो लड़की पर दोषारोपण करते बहुत सुना है क़ी लड़की के ग्रह ख़राब होंगे किन्तु पत्नी मर जाये तो लड़के पर यही दोष मढ़ते कभी नहीं सुना | अतः स्त्री पुरष क़ी समानता क़ी लहलहाती फसल को काटने के लिए पारंपरिक भारतीय संस्कृत भी बहुत हद तक उत्तरदायी है |

ग्रामीण अंचलों में तो स्त्रिओं क़ी हालत और भी बदतर है | एक ओर स्त्री परिवार का भरण पोषण करने क़ी लिए दिन भर मेहनत मजदूरी करके दो पैसे कमाती है तो दूसरी तरफ पति दिन दोपहर नशे में धुत रहता है | थक कर चूर-चूर हो चुकी उस महिला को सुकून क़ी दो रोटी नहीं, पति परमेश्वर क़ी मारपीट और गालियाँ मिलती हैं | क्या जरूरत है सबकुछ नसीब पर छोड़ने क़ी..? कब तक चलता रहेगा परम्परों का यह ढोंग..कब तक....? अरे मूर्खो सीता जैसी पतिव्रता नारी उसी स्त्री को होना चाहिए जिसका पति भी राम हो, किन्तु यदि पति ही रावण है तो आज सीता नहीं दुर्गा क़ी आवश्यकता है |

हकीकत तो यह है क़ी नारी क़ी सामाजिक दुर्दशा क़ी व्याख्या करना मेरी लेखनी क़ी शक्ति से परे है | मैं पश्चिमी सभ्यता का विरोधी नहीं हूँ और ना ही पक्षधर हूँ पारंपरिक भारतीय संस्कृति का | पश्चिमी सभ्यता के अन्धानुकरण को बंद कीजिये और नैतिकता एवं बुद्धि विवेक के तराजू में तोलकर उन विचरों को अपनाइए जो अनुकरणीय हैं | हम आध्यात्म एवं संस्कृति में पश्चिमी सभ्यता से बहुत आगे हैं| आधुनिक बनने क़ी होड़ में इस पावन संस्कृति का गला घोंटने क़ी कोई जरुरत नहीं | आज जरुरत है समय के उद्घोष को अंतर्मन से सुनने क़ी और वर्तमान परिस्थितियों में औचित्यहीन हो चुकी परम्परों के खिलाफ एक वैचारिक क्रांति लाने क़ी, जिसका उद्घोष किसी मंच से नहीं समाज क़ी आणविक इकाई परिवार से होना आवश्यक है |


वास्तव में अब हमें भौतिकता के वशीभूत इस समाज में नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा पद्यति का बीजारोपण कर, अपनी गौरवशाली शंस्कृतिक धरोहर को संजोते हुए भारतवर्ष में इस उक्ति को चरितार्थ करना होगा - "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता " |


गौरव पन्त
२ नवम्बर,२०१०