Saturday, January 26, 2013

प्यार का पंचनामा .....

ये एक सफ़र है कॉलेज से शादी तक का .......

ऐसा क्या है उन आँखों में,
जो मैं खुद को ही भूल गया;
कॉलेज जाने निकला था;
और उनके घर से ही लौट गया ।।

                                     उडती जुल्फों को जब भी वो,
                                     नजरों से हटाने जाती है;
                                     नयनो के बाण चलाकर यूँ;
                                     घायल मुझको कर जाती है ।।
ना देखूं इक दिन भी उनको,
किस्मत से शिकायत करता हूँ ;
मिल जायें तो क़यामत होती है,
और रब से इबादत करता हूँ  ।।
                                     हुश्न दिया उनको तूने,
                                     अब प्यार जरा सिखला दे तू;
                                     उनके बिन दिल का क्या आलम है ;
                                     इक उन्हें बतला दे तू ।।
दिन रात करवटें लेता हूँ ,
यूँ उनके सपनो में जगता हूँ;
तकिये को बाहों में भरकर;
चुपचाप यूँ ही सो जाता हूँ  ।।
                                    अक्सर दोस्तों की महफ़िल में,
                                    तरकीब बताई जाती है ;
                                    प्यार जताने की हमको ;
                                    हर युक्ति सिखाई जाती है ।।
यूँ पहला अध्याय प्यार का पढकर ,
इजहार प्यार का करते हैं ;
और उनके ना कहने के बहाने ;
जब हम कुछ ऐसे सुनते हैं ।।
                                   कभी सोचा ही नहीं इस बारे में ,
                                   बस अच्छा दोस्त समझते हैं ;
                                   कमबख्त दिल का दर्द लिए;
                                   हम मदिरालय चल पढ़ते हैं ।।
फिर कभी कभी आंखें नम सी,
हो जाती हैं हाल सुनाने में;
और कभी कभी दिल-ए-दर्द की;
बातें होती मयखाने में ।।
                                 कमबख्त ये दिल तो पागल है ,
                                 जो बस उनपर ही मरता है;
                                 वो लाख मना कर दें मुझको ;
                                 ये प्यार उन्हीं से करता है ।।
यूँ दिल में प्यार का दर्द लिए,
इक दिन कॉलेज से चल पढ़ते हैं;
नयी नौकरी नयी छोकरी ;
ढूँढने की सपथ लेते हैं ।।
                                 हाय जवानी बीत गयी ,
                                 अब दाल कहीं नहीं गलती है ;
                                 तब मम्मी - पापा की तरफ;
                                 आशा की नजरें उठती हैं ।।
कैसी लड़की चाहिए तुझको ,
जब मम्मी ये पुछा करती है;
तब अपने भी अरमानों की,
एक लम्बी लिस्ट निकलती है ।।
                                  घने रेशमी बालों वाली ,
                                  खूबसूरत और प्यारी हो ;
                                  नीली नीली आँखों वाली ;
                                  लगती राजकुमारी हो ।।
लम्बी ना मोटी छोटी,
जीरो फिगर वाली हो ;
चंद्रमुखी से भी खूबसूरत;
माँ..! मेरी घरवाली हो ।।
                                  कैसे कैसे आरमान लिए ,
                                  खाव्बों में खोये रहते हैं ;
                                  वो जान -ए -हया कैसी होगी;
                                  दिन रात सोचते रहते हैं ।।
इकदिन  छोटी मोटी सी,
एक बीवी भी मिल जाती है ;
यूँ सारे अरमानों की;
अर्थी भी उठ जाती है ।।
                                  अब तो बस बीवी बच्चों की,
                                  फरमाईश पूरी करता हूँ ;
                                  क्यों शादी कर ली मैंने;
                                  अक्सर ये सोचा करता हूँ ।।
सुबह सुबह हनी कहकर,
पुचकार के मुझे उठाती है;
सड़ी हुयी चाय पिलाकर ;
नाश्ता तैयार करवाती है ।।
                                   अब कोल्हू के बैल की तरह ,
                                   दिन भर काम करवाती है ;
                                   गलती हो या ना हो मेरी;
                                   डायन.. मुझपर ही गुर्राती है ।।
यूँ पंचनामा हुआ प्यार का ,
अब ना हसरत कोई बांकी है ;
ना तेरी ना मेरी प्यारे ;
हम सबकी यही कहानी है ।।


गौरव पन्त
27 जनवरी 2013
             


 


Wednesday, August 15, 2012

अहले वतन के लोगो, सुन लो मेरी जुबां को....

अहले वतन  के लोगो, सुन लो मेरी जुबां को,
दिल के गुबार को या अश्कों की दास्ताँ को।।

आवाज है ये उनकी, जो शहीद हो गये हैं,
इक हंसी चमन को देने, जो कफ़न लिए चले हैं;
यह इक रजा है उनकी, सन्देश है वतन को,
हिमगिरि सदा मुकुट हो,सागर ही धोये पग को ।।१।।

हिन्दू नहीं ना मुस्लिम,ना सिक्ख ना ईसाई,
ममता के आँचल की, क्यों कीमतें लगाई ;
आंसू संजोये आंखें, निहारें सदा तुम्हीं को ,
आपस में प्यार बांटो,बांटो नहीं वतन को ।।२।।

हाथों में दे दो हाथ, क़दमों से कदम मिला लो,
एकता की ज्योति थामो,कुछ पुण्य धन कमाओ;
इससे पहले की हस्ती हमारी, राह-ए -ख़ाक हो,
हर दिल में जगा दो यारो, देशभक्ति की अलख को ।।३।।

अहले वतन  के लोगो, सुन लो मेरी जुबां को,
दिल के गुबार को या अश्कों की दास्ताँ को।।

                                                गौरव पंत

Sunday, July 22, 2012

विवाह क्या है...!!!

एक रोज एक मित्र की शादी तय हुयी तो मेरे यह पूछने पर कि किससे हो रही है -- जवाब मिला इंजीनियर से हो रही है। कुछ समय बाद दूसरे दोस्त की शादी में उनके पिताजी से भी यही प्रश्न पूछा तो जवाब मिला वो (कोई गावं का नाम ) के हैं , लड़का डाँक्टर है,एकलौता लड़का है ,उसके पिता रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं,दिल्ली में दो फ्लैट हैं ..., उनसे हो रही है। तबसे मन में एक ही सवाल उठ रहा है -- आखिर विवाह क्या है ?...व्यापार ..! आखिर कब डिग्रियों की नहीं ,इंसानों की शादी होगी।
 
 विवाह क्या है, दो आत्माओं का मिलन ,
या भौतिक जरूरतें पूरा करने का जरिया है ।
ये त्याग है , प्रेम है , या कोई पूजा ,
या लोभ धन लालच का आधुनिक नाम है यह ;
आखिर क्या है यह विवाह ...क्या..?

इक व्यवसाय है ,फरेब है ,धोखा है ,
प्यारे ये इन्सान है ,जो बस पैसे का भूखा है ,
इक ओर अपना बीता कल छुपाते हैं हम ,
क्यों जीवनसाथी से ह़ी, कुछ छिपाते हैं हम ;
कीचड से सना हो ,चाहे जीवन हमारा ,
पर कमल के फूल सा दर्शाते हैं हम,
वो रिश्ते ही क्या , जो सच से घबरायें ,
वो जीवनसाथी ही क्या, जिससे हकीकत छिपायें;
कर्म चाहे हों हमारे, कोयले से काले ,
ढूध से धुला जीवनसाथी,चाहते हैं हम।
अगर ये रिश्ते खुदा ही बनाता है तो ,
फिर क्यों व्यसाय किया करते हैं हम;
एक सा पेशा हो या नोटों की बारिश,
कुबेर देवता गर करें थोड़ी सी शिफारिश;
पूरब से पश्चिम का मेल करने को,
घोड़ी या डोली , चढ़ जाते हैं हम ।

कभी कुंडली में अपना भविष्य टटोलकर ,
नियति बदलने की असफल कोशिश करते हैं ,
तो कहीं दुल्हन-डिग्री का व्यापार करते हैं,
कभी सोचा है, क्या कभी हम प्यार करते हैं ;
यहाँ पैसे से बिकता है प्यार भी प्यारे ,
बोली लगती हैं , दिलदार की प्यारे।
अजी ..! टीचर को क्या चाहिए, बस टीचर,
क्या फर्क पढता है , हो चाहे वो फटीचर।
डाँक्टर ,इंजीनियर की डिग्री , सारी सम्पत्ति का ,
लेखा -जोखा होता है ,यहाँ हर  डिग्री का ;
विवाह क्या है ,व्यवसाय हाथी का,
जिन्दा लाख तो मरा सवा लाख का ;
कुछ ऐसा हो चुका है , प्यारा समाज मेरा,
वर वधु चाहे जैसे ,पर हो संपत्ति का बसेरा ;
सात फेरों की ,क्या होती हैं सात कसमें,
चलो छोड़ो यारो , ये नहीं हैं अपने बस में;

क्योंकि पहली सभ्यता हैं हम विवाह के व्यापार की,
ना बदलना इनको, दुहाई मिलेगी तुम्हें थात की;
हैं जगतगुरु हम ,दहेज़-हत्या और उत्पीड़न में ,
लड़कियों के व्यापार में,जी हाँ , प्यार के व्यापार में भी ..!
और इस  प्यार के व्यापार का इक सामाजिक  नाम है ...
..............विवाह...! ..................
 


गौरव पंत
21-जुलाई -2012

Sunday, July 8, 2012

ये कैसी जिंदगी...!!


जिन्दगी की कशमकश में  कभी जिन्दगी नज़र नहीं आती ..नज़र आती है तो बस मशीन ...कौन आज ज्ञान के लिए पढता है ..हम तो पढ़ते हैं बस नौकरी के लिए..."तारे जमीन पे" और "3 idiots" जैसी फिल्मे तो बहुत बनेंगी ...पर क्या कभी हम बदलेंगे...!

कभी ख़ामोशी , तो कभी महफ़िल में ,
कभी आप में , चुपचाप में ,
मै खुद की  खामोशियाँ टटोलता हूँ ।
कुछ अनबन, कुछ उलझन सी मन में ,
जीत हार  के  जाल  फंसें  जीवन में ,
ना  जाने  मैं क्या ढूंढता हूँ।

कभी सोचा जीवन क़ा अर्थ क्या,
मशीन जो  बस भागे जा रही है ,
बचपन किताबों का बोझ ढोता रहा ,
जवानी अर्थ हित व्यर्थ  हो  रही ,
यूँ एक दिन बुढ़ापा आ थाम  लेगा ,
और ये जीवन भी न रहेगा ।
 
वो कल जो कभी आज ना बना,
वो बीते पल जो मनमाफिक ना हुए,
ढूंढता रहा अपने वजूद को खुद में,
कभी तो मुझमे भी इक इन्सान मिले,
कभी सोचकर इनको पूछता हूँ खुद से ,
इतने बसन्त बीते ,पर कभी जिन्दगी जिये ..?

पर क्यों..! कैसे मिलूं सकूँ मैं खुद से,
मैं तो एक भौतिक कठपुतली हूँ..कठपुतली..!
मैं कल का विद्यार्थी ,लेजाकर विद्या की अर्थी,
बेचता हूँ बाज़ार में, ले कौड़ियों के मोल,
क्योंकि बचपन से आजतक,अपना वजूद मिटाया मैंने,
और लो आज मैं खुद को ही बेचने चला हूँ...!!


गौरव पंत
8-जुलाई-2012